रंगबिरंगे मुखौटे पहनकर अपने चेहरे की कालिख छुपाने की कोशिशें और दूसरों के विराटाकार व्यक्तित्व में अपने बौने अक्स प्रत्यारोपित करके खुद को बड़ा दिखाने का भरम पैदा करना संघ और उसके कुनबे का चौबीसों घंटा सातों दिन किये जाने वाला काम है। उनकी मजबूरी भी है क्योंकि इस धरा पर यही एकमात्र संगठन है जिसके पास पूरी सौ साल की जिन्दगी में सकारात्मक उपलब्धि के नाम पर दिखाने के नाम पर निल बटा सन्नाटा है।
इस हड़बड़ाहट में ये इतने सिड़बिल्या जाते हैं कि आधारहीन और सरासर बेबुनियाद यहाँ तक कि जाहिर उजागर असलियत से ठीक उलट दावों की खेप दर खेप पेल जाते हैं : इतनी ऊंची फेंकते जिसकी कोई सीमा नहीं है। इस मामले में उन्होंने अपने प्रणेता गोयबल्स को ‘गुरु गुड़ रह गए चेले शक्कर हो गए’ की उक्ति से भी पीछे छोड़ दिया है : गोयबल्स गन्ना रह गए हैं और उनके हिंदुस्तानी चैप्टर के शिष्य उनसे हजार जूते आगे निकल मिसरी बनने पर आमादा हैं।
अभी हाल में मोदी जी ने बांग्ला भाषा के प्रसिद्द साहित्यकार बंकिमचंद्र चटर्जी का “सम्मान” किया। मृत्यु के 132 वर्ष बाद जिन बंकिम बाबू को, उनकी एक भी किताब शायद ही कभी हाथ में लेने वाले कुनबे के स्टार प्रचारक, सम्मानित कर रहे थे वे बांग्ला के मशहूर लेखक बंकिम बाबू नहीं थे, कुनबे के द्वारा गढ़े और लीपपोत कर ख़ास तरह से श्रंगारित किये गए बंकिम बाबू थे। अंतर्विरोधों से भरे होने के बावजूद बंकिम चंद्र चटर्जी सिर्फ एक उपन्यास के दम पर आरएसएस हजम कर ले इतने सहज रचनाकार नहीं हैं।
वे एक ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने अपने समय में अपनी रचनाओं के जरिए जनता में उस ब्रिटिश राज के विरोध में चेतना जगाई थी, जिसकी चाकरी में संघ ने क्या क्या नहीं किया था यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है।
संघ जिनकी आभा में अपने कलंक छुपाने की जुगाड़ में हैं ये वे बंकिम बाबू हैं जिन्होंने बंगाल के जमींदारों द्वारा गरीब किसानों के शोषण और जाति व्यवस्था की अत्यंत तीखी आलोचना की और उस समय के पश्चिम के समाजवादियों से प्रेरित होकर ‘साम्य” शीर्षक से निबन्ध लिखकर साम्यवाद की स्थापना करने की बात भारत में पहली बार उठाई थी : वह भी तब जब मार्क्सवाद दुनिया में लोकप्रिय होना शुरू कर ही रहा था।
ऐसा ही जबर झूठ श्यामाप्रसाद मुखर्जी को बंगाल की एकता और न जाने किन किन महानताओं का प्रतीक बताकर बोला गया। जबकि उनका वास्तविक योगदान इससे ठीक उलटा था। यह श्यामाप्रसाद ही थे जो हिन्दू मुस्लिम के आधार पर भारत विभाजन की सावरकरी धारणा के ध्वजावाहक ही नहीं उनकी हिन्दू महासभा के नेता भी थे।
इतना ही नहीं, बंगाल और देश के बंटवारे की बात करने वाले सोहरावार्दी की मुस्लिम लीग सरकार में मंत्री रहे। मंत्री की हैसियत से वायसराय और अंग्रेज हुकूमत को चिट्ठियाँ लिख-लिख कर भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन को सख्ती के साथ कुचल देने की सलाह दे रहे थे। जब मीडिया बगलबच्चा बना हो तब बिना पलक झपकाए झूठ बोलने से डर किसका?
चलिए मान लेते हैं कि ये सब इतिहास की बाते हैं, आम लोग इतिहास में इतनी गहराई तक नहीं उतरते मगर भैय्ये, जो ताजे-ताजे हैं कम से कम उन मामलों में तो थोड़ी सी शर्म थोड़ा सा लिहाज होना चाहिए। जून 1975- मार्च 1977 का आतंरिक आपातकाल – जिसे इमरजेंसी कहा गया – तो अभी बहुत पुरानी बात नहीं है। इस 26 जून को एक बार फिर भाजपा और आरएसएस ने इस इमरजेंसी के खिलाफ जूझने और लोकतंत्र बहाली की लड़ाई लड़ने की बड़ी बड़ी डींगे मारीं।
देर से ही सही मगर इमरजेंसी लाने वालों ने उसके लिए माफ़ी मांग ली मगर जिन्होंने इमरजेंसी लाने वालों के आगे झुकने, समर्पण करने के माफीनामे लिख-लिखकर भारत की जेलों को अपने आंसुओं की बाढ़ से डुबो दिया था : इस आतंरिक आपातकाल के नाम से लायी गयी एकदलीय तानाशाही की प्रशंसा में ऐसा ऐसा लिखा था जैसा खुद उसे लाने वाले नहीं लिख पा रहे थे : इसके लिए इन्होने कोई माफ़ी मांगी क्या?
तब भाजपा नहीं थी उसका पूर्व अवतार जनसंघ था – मगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो यही था। जिस इमरजेंसी को संघ से लेकर भाजपा तक आज बुरी बता कर कोस रही है, इससे बड़ा झूठ और पाखण्ड कोई और नहीं हो सकता। इमरजेंसी में यह इंदिरा गांधी के आगे पूरा लम्बलोट और दंडवत था। यही आरएसएस और भाजपा का पूर्ववर्ती संस्करण जनसंघ-उस इमरजेंसी में भी, जेलों में जाने के बाद भी आपातकाल के समर्थन और इंदिरा गांधी की तारीफ में कसीदे काढ़ रहे थे। माफीनामे की चिट्ठियों की बाढ़ ला रहे थे।
यहाँ इनमे से कुछ की याद ताजा कर लेना काफी होगा।
इसके तबके सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उर्फ बाला साहब देवरस तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लगातार चिट्ठी के बाद चिट्ठी लिख रहे थे। चिट्ठियाँ जिनमें याचना भी थी, मुक्तकंठ सराहना भी थी, प्रार्थना और अभ्यर्थना भी थी। देवरस जी ने पहली चिट्ठी 22 अगस्त, 1975 को लिखी, जिसकी शुरुआत ही सराहना से थी। उन्होंने लिखा, ”मैंने 15 अगस्त, 1975 को रेडियो पर लाल क़िले से राष्ट्र के नाम आपके संबोधन को यहां कारागृह (यरवदा जेल) में सुना था। आपका यह संबोधन संतुलित और समय के अनुकूल था। इसलिए मैंने आपको यह पत्र लिखने का फ़ैसला किया।’’
10 नवंबर, 1975 को इंदिरा गांधी को एक और पत्र लिखा। इसमें ”सुप्रीम कोर्ट के सभी पाँच न्यायाधीशों ने आपके चुनाव को संवैधानिक घोषित कर दिया है, इसके लिए हार्दिक बधाई।’’ उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि ”आरएसएस का नाम जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के साथ अन्यथा जोड़ दिया गया है। सरकार ने अकारण ही गुजरात आंदोलन और बिहार आंदोलन के साथ भी आरएसएस को जोड़ दिया है… संघ का इन आंदोलनों से कोई संबंध नहीं है…।’’
इंदिरा गांधी ने जब इन चिट्ठियों का जवाब नहीं दिया तो आरएसएस प्रमुख देवरस ने आपातकाल को ‘अनुशासन पर्व’ बताने वाले विनोबा भावे से संपर्क साधा। 12 जनवरी, 1976 को विनोबा भावे को भेजे पात्र में संघ के प्रमुख ने उनसे विनंती की कि वे आरएसएस पर लगे प्रतिबंध को हटाए जाने के लिए इंदिरा गाँधी को सुझाव दें। विनोबा भावे ने भी देवरस के पत्र का जवाब नहीं दिया।
हताश देवरस सीधे-सीधे याचना करने पर आ गए।
उन्होंने विनोबा को एक और पत्र लिखते हुए कहा कि ”अख़बारों में छपी सूचनाओं के अनुसार प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी 24 जनवरी को वर्धा, पवनार आश्रम में आपसे मिलने आ रही हैं। उस समय देश की वर्तमान परिस्थिति के बारे में उनकी आपके साथ चर्चा होगी। मेरी आपसे याचना है कि प्रधानमंत्री के मन में आरएसएस के बारे में जो ग़लत धारणा घर कर गई है, आप कृपया उसे हटाने की कोशिश करें, ताकि आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हटाया जा सके और जेलों में बंद आरएसएस के लोग रिहा होकर प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश की प्रगति के लिए सभी क्षेत्रों में अपना योगदान कर सकें।’’
इंदिरा गांधी से बात नहीं बनी तो इन्होंने संजय गांधी, वीसी शुक्ला और बंसीलाल तक दूत दौड़ाये थे। रिहा करने की गुहार की थी ताकि बाहर निकल कर सब के सब 25 सूत्री कार्यक्रम को लागू कराने के राष्ट्रभक्ति के काम में प्राण-पण से जुट सकें। तत्कालीन संघ प्रमुख ने तो बाकायदा लिखापढ़ी में चिट्ठियां भी लिखी थीं।
इन चिट्ठियों-संदेशों मे इंदिरा गांधी के बदनाम 20 सूत्रीय कार्यक्रम और संजय गांधी के कुख्यात 5 सूत्री कार्यक्रम –जिसका एक परिणाम जबरिया नसबन्दी थी- को राष्ट्रहित में किये जा रहे कार्य निरूपित करते हुए कातर गुहार की गयी थी कि हम सबको रिहा किया जाए ताकि इन दोनों ‘महान कार्यक्रमों’ को पूरा करने के राष्ट्रीय कर्तव्य में आरएसएस भी प्राणपण से जुट सके। आरएसएस की ये चिट्ठियां राष्ट्रीय रिकॉर्ड का हिस्सा हैं, सार्वजनिक प्रकाशनों में भी उपलब्ध हैं।
इस तरह आज जो आपातकाल की तानाशाही के खिलाफ संघर्ष के सूरमा बनने की कोशिश कर रहे हैं वे असल में उस तानाशाही के न सिर्फ मुरीद थे बल्कि उसे और सख्ती से अमल में लाने के राष्ट्र सेवा के काम में जुट जाने के लिए उनके चरणों में बिछे जा रहे थे। जब खुद संघ प्रमुख यह कर रहे थे तो उनके अनुयायियों को तो यह सब करना है था। इतने जाहिर उजागर समर्पण के रिकॉर्ड के बावजूद 26 जून को भाजपाइयों का इमरजेंसी राग वैसा ही है जैसा एक हिंदी कहावत में कहा गया है कि “सूप बोले तो बोले चलनी भी बोल उठी जिसमें बहत्तर सौ छेद!!”
इमरजेंसी में आरएसएस का चिट्ठी सरेंडर कोई इकलौती घटना नहीं है। इसका इतिहास इस तरह के कारनामों से भरा पड़ा है – इसके जितने भी इतिहास पुरुष है वे सब सरेन्डरी चिट्ठियाँ लिख लिखकर ही बड़े हुए हैं। इसे सावरकर आसन कहा जाता है जिनकी ब्रिटेन की महारानी को लिखी चिट्ठियों की सच्चाई पिछले सप्ताह स्वयं उनके प्रपौत्र ने महाराष्ट्र की एक अदालत में बयान देते हुए क़ुबूल भी कर ली है।
इन्हीं सावरकर ने गांधी हत्याकांड में गिरफ्तार होने के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भी तीन चार चिट्ठियाँ लिखकर रिहाई की गुहार लगाई थी : घर में ही बंद रहूँगा, बाहर नहीं निकलूंगा, हिन्दू महासभा के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दूंगा वगैरह-वगैरह की कातर पेशकश भी की थी। उसी हत्याकांड के समय संघ पर प्रतिबन्ध के बाद जेल में निरुद्ध तबके सरसंघचालक एम एस गोलवलकर ने सरदार पटेल को लिखी चिट्ठियों में भी इसी तरह का प्रलाप किया था।
संघ का संविधान बनाने, उसकी गोपनीय और षडयंत्रकारी गतिविधियाँ बंद करने और कभी राजनीति में भाग न लेने जैसे अनेक कौल- करार किये थे। आने वाले दिनों में भी कभी ऐसा अवसर आया तो संघ इस आसन से नहीं चूकेगा।
इसमें दो मत नहीं कि संघ द्वारा उस आपातकाल के समय दिखाई गयी कातरता, किया गया समर्पण राजनैतिक निष्ठा और व्यक्तिगत साहस की कमी और इस तरह कायरता का लक्षण है। स्वाभाविक भी है : तानाशाह बिना किसी अपवाद के कायर होते हैं, उनका सारा शौर्य दिखावटी होता है और सत्ता के तंत्र का मोहताज होता है। फासिस्टों के बारे में यह बात एक तरह से नियम ही है। मगर इस तरफ के फासिस्टों के संस्करण के साथ सिर्फ ऐसा भर नहीं है।
इमरजेंसी के समर्थन के पीछे उनका डर था, जेल से बाहर निकलने की लालसा थी – मगर उस तानाशाही के प्रति सहमति तथा उस दौरान उठाये गए दमनकारी तुर्कमान गेट काण्ड, जबरिया नसबंदी, उद्योग घरानों को दी जा रही छूट, प्रेस सेंसरशिप आदि क़दमों के प्रति उनका दिली समर्थन था। यही वजह है कि इमरजेंसी जिनके जुल्मों और अत्याचारों के लिए कुख्यात हुई वे भाजपा के माननीय नेता बने।
संजय गाँधी की राजनीतिक विरासत के रूप में मेनका गाँधी और तुर्कमान गेट की बर्बरता के दोषी जगमोहन भाजपा ने चंदन की तरह माथे पर धारे। सरकार में आते ही, सत्ता पर पूर्ण वर्चस्व कायम होते ही उसने ऐसे कदम उठाये जिनके आगे 75 से 77 की इमरजेंसी मिर्ज़ा ग़ालिब का बाजीचा-अतफ़ाल : बच्चों के खेल जैसा लगती है। पिछले 12 वर्षों से मोदी राज का आफ़तकाल 51 वर्ष पहले लगे इंदिरा गांधी के आतंरिक आपातकाल से आगे की, काफी आगे की बात है।
तब आर्थिक ठहराव और हुक्मरानों के बढ़ते अलगाव का समय था, आज आर्थिक संकट न केवल अब तक का सबसे गंभीर रूप ले चुका है, बल्कि इससे निबटने के नाम पर अपनाई जा रही नीतियां आगामी समय में भी इससे उबरने की उम्मीद नहीं दिखातीं। रहे मौजूदा हुक्मरान तो वे इतने आभासीय गुम्बद पर खड़े हैं कि महज सप्ताह भर का स्वतंत्र और बेबाक मीडिया और जनतांत्रिक प्रतिरोधों की आजादी काफी है उनका शीराजा बिखेरने के लिए। इसीलिए मीडिया पूरी तरह कब्जे में है।
तब घोषित सेंसरशिप के बावजूद मीडिया पूरी तरह दिवंगत नहीं हुआ था। आज उससे कहीं कड़ी अघोषित सेंसरशिप ने मीडिया का मुंह ही बंद नहीं किया, उस पर कब्जा करके उसे कारपोरेटी हिंदुत्व की विषबेल फैलाने का जरिया बना कर रख दिया है। इमरजेंसी, भले दिखावे के लिए ही सही, सूदखोरी और जमाखोरी से मुक्ति के कदम लेकर आयी थी ; मोदी का आफ़तकाल जमाखोरी, कालाबाजारी को कानूनन जायज बनाने में लगा है।
इंदिरा गांधी के आपातकाल ने छात्रआंदोलन के अपने से असहमत नेताओं को निशाने पर लिया था – आफ़तकाल में विश्वविद्यालयों और समूची शिक्षा को ही ध्वस्त करने की जुगत भिड़ाई जा रही है। बुलडोजर सिर्फ घरों पर नहीं चल रहा, उस सब पर चल रहा है जिसने भारत को भारत बनाया। उस विचलन ने तब 25 साल पुराने संविधान के लोकतांत्रिक प्रावधानों के साथ खिलवाड़ किया था – मौजूदा गिरोह पूरे 5000 साल के सकारात्मक हासिल को शून्य बनाने पर आमादा है।
इसका यह मतलब कतई नहीं है कि 1975-77 का आपातकाल अच्छा था। निस्संदेह 1975 की 26 जून भारतीय लोकतंत्र का काला दिन था। इसने न सिर्फ लोकतन्त्र के प्रति भारतीय जनता के विश्वास को खण्डित किया बल्कि इसी कालिमा ने वह परिस्थितियां उत्पन्न कीं जिनका नतीजा आज गहरे होते अन्धकार में भेड़ियों के राज्याभिषेक, बर्बरता के महिमामण्डन और हत्यारों की प्राणप्रतिष्ठा के रूप में सामने है।
यह वह हादसा था जिसने काफी हद तक भारतीय समाज के रूपांतरण को रोक दिया – नतीजे में मध्य युग की ओर वापसी के लिए आतुर तत्पर अमानुषों के हाथ में अगुआई आ गयी। 26 जून 1975 नहीं होता तो बहुत मुमकिन है कि 26 मई 2014 भी नहीं होता।
जरूरत उस इमरजेंसी के सबकों को याद करने की है ताकि आज की इस अघोषित और ज्यादा बर्बर इमरजेंसी का मुकाबला किया जा सके। जरूरत इन पाखंडियों को बेनकाब करने की भी है। ऐसा करते हुए ही संविधान, उसमें वर्णित अधिकारों और लोकतंत्र को बचाने के साथ साथ मेहनतकश जनता,सभ्य समाज और देश के भविष्य को बेहतरी की ओर ले जाने के अनुकूल वातावरण बनाया जा सकता है।
इसे कई बार कहा जा चुका है, दोहराने में हर्ज नहीं कि जो अपने इतिहास से सबक नहीं लेते वे उस इतिहास को फिर से भुगतने के लिए अभिशप्त होते हैं, पहले प्रहसन में उसके बाद त्रासदी में।
(बादल सरोज लोकजतन के संपादक हैं और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)